चाह नहीं, मैं सुरबेला के
गहनों में गुँथा जाऊँ।
चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ।
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर, हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ।
मुझे तोड़ लेना, वनमाली,
उस पथ में देना तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जाएँ वीर अनेक।
Sunday, July 5, 2009
तितली
दूर देश से आई तितली,
चंचल पंख हिलाती।
फूल-फूल पर, कली-कली पर,
इतराती, इठलाती।
कितने सुंदर हैं पर इसके,
जगमग रंग-रँगीले।
लाल, हरे, बैंजनी, वसन्ती,
काले, नीले, पीले।
बच्चों ने जब देखी इसकी,
खुशियाँ, खेल निराले।
छोड़छाड़ कर खेल-खिलौने,
दौड़ पड़े मतवाले।
अब पकड़ी तब पकड़ी तितली,
कभी पास है आती।
और कभी पर तेज़ हिलाकर,
दूर बहुत उड़ जाती।
बच्चों के भी पर होते तो,
साथ-साथ उड़ जाते।
और हवा में उड़ते-उड़ते,
दूर देश हो आते।
चंचल पंख हिलाती।
फूल-फूल पर, कली-कली पर,
इतराती, इठलाती।
कितने सुंदर हैं पर इसके,
जगमग रंग-रँगीले।
लाल, हरे, बैंजनी, वसन्ती,
काले, नीले, पीले।
बच्चों ने जब देखी इसकी,
खुशियाँ, खेल निराले।
छोड़छाड़ कर खेल-खिलौने,
दौड़ पड़े मतवाले।
अब पकड़ी तब पकड़ी तितली,
कभी पास है आती।
और कभी पर तेज़ हिलाकर,
दूर बहुत उड़ जाती।
बच्चों के भी पर होते तो,
साथ-साथ उड़ जाते।
और हवा में उड़ते-उड़ते,
दूर देश हो आते।
पथ की पहचान by हरिवंश राय 'बच्चन' (excerpted from 'सतरंगिनी)
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!
पुस्तकों में है नहीं, छपी हुई इसकी कहानी,
हाल इसका ज्ञात होता, है न औरों की ज़बानी,
अनगिनत राही गए इस राह से, उनका पता क्या,
पर गए कुछ लोग इस पर, छोड़ पैरों की निशानी,
यह निशानी, मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है,
खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले!
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!
है अनिश्चित किस जगह पर, सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,
है अनिश्चित किस जगह पर, बाग़ बन सुंदर मिलेंगे,
किस जगह यात्रा ख़तम हो जायगी, यह भी अनिश्चित,
है अनिश्चित, कब सुमन, कब कंटकों के सर मिलेंगे
कौन सहसा छूट जाएँगे, मिलेंगे कौन सहसा,
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा तू न, ऐसी आन कर ले :
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!
कौन कहता है कि स्वप्नों को न आने दे हृदय में,
देखते सब हैं इन्हें, अपनी उमर, अपने समय में,
और तू कर यत्न भी तो, मिल नहीं सकती सफलता,
ये उदय होते लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में,
किन्तु जग के पंथ पर यदि, स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो, सत्य का भी ज्ञान कर ले :
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!
स्वप्न आता स्वर्ग का, दृग-कोरकों में दीप्ति आती,
पंख लग जाते पगों को, ललकती उन्मुक्त छाती,
रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता,
रक्त की दो बूँद गिरतीं, एक दुनिया डूब जाती,
आँख में हो स्वर्ग लेकिन, पाँव पृथ्वी पर टिके हों,
कंटकों की इस अनोखी सीख का सम्मान कर ले,
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!
यह बुरा है या कि अच्छा व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
जब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना,
तू इसे अच्छा समझ, यात्रा सरल इससे बनेगी,
सोच मत केवल तुझे ही यह बड़ा मन में बिठाना,
हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर पड़ा है,
तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के, बटोही, बाट की पहचान कर ले।
पुस्तकों में है नहीं, छपी हुई इसकी कहानी,
हाल इसका ज्ञात होता, है न औरों की ज़बानी,
अनगिनत राही गए इस राह से, उनका पता क्या,
पर गए कुछ लोग इस पर, छोड़ पैरों की निशानी,
यह निशानी, मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है,
खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले!
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!
है अनिश्चित किस जगह पर, सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,
है अनिश्चित किस जगह पर, बाग़ बन सुंदर मिलेंगे,
किस जगह यात्रा ख़तम हो जायगी, यह भी अनिश्चित,
है अनिश्चित, कब सुमन, कब कंटकों के सर मिलेंगे
कौन सहसा छूट जाएँगे, मिलेंगे कौन सहसा,
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा तू न, ऐसी आन कर ले :
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!
कौन कहता है कि स्वप्नों को न आने दे हृदय में,
देखते सब हैं इन्हें, अपनी उमर, अपने समय में,
और तू कर यत्न भी तो, मिल नहीं सकती सफलता,
ये उदय होते लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में,
किन्तु जग के पंथ पर यदि, स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो, सत्य का भी ज्ञान कर ले :
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!
स्वप्न आता स्वर्ग का, दृग-कोरकों में दीप्ति आती,
पंख लग जाते पगों को, ललकती उन्मुक्त छाती,
रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता,
रक्त की दो बूँद गिरतीं, एक दुनिया डूब जाती,
आँख में हो स्वर्ग लेकिन, पाँव पृथ्वी पर टिके हों,
कंटकों की इस अनोखी सीख का सम्मान कर ले,
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!
यह बुरा है या कि अच्छा व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
जब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना,
तू इसे अच्छा समझ, यात्रा सरल इससे बनेगी,
सोच मत केवल तुझे ही यह बड़ा मन में बिठाना,
हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर पड़ा है,
तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के, बटोही, बाट की पहचान कर ले।
दीप जलाओ, दीप जलाओ
दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।
खुशी-खुसी सब हँसते आओ,
आज दिवाली रे।
मैं तो लूँगा खील-खिलौने,
तुम भी लेना भाई।
नाचो, गाओ, खुशी मनाओ,
आज दिवाली आई।
आज पटाखे खूब चलाओ
आज दिवाली रे।
दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।
नए-नए मैं कपड़े पहनूँ,
खाऊँ खूब मिठाई।
हाथ जोड़कर पूजा कर लूँ
आज दिवाली आई।
खाओ मित्रो, खूब मिठाई,
आज दिवाली रे।
दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।
आज दुकानें खूब सजी हैं,
घर भी जगमग करते।
झलमल-झलमल दीप जले हैं
कितने अच्छे लगते।
आओ, नाचो, खुशी मनाओ,
आज दिवाली रे।
दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।
आज दिवाली रे।
खुशी-खुसी सब हँसते आओ,
आज दिवाली रे।
मैं तो लूँगा खील-खिलौने,
तुम भी लेना भाई।
नाचो, गाओ, खुशी मनाओ,
आज दिवाली आई।
आज पटाखे खूब चलाओ
आज दिवाली रे।
दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।
नए-नए मैं कपड़े पहनूँ,
खाऊँ खूब मिठाई।
हाथ जोड़कर पूजा कर लूँ
आज दिवाली आई।
खाओ मित्रो, खूब मिठाई,
आज दिवाली रे।
दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।
आज दुकानें खूब सजी हैं,
घर भी जगमग करते।
झलमल-झलमल दीप जले हैं
कितने अच्छे लगते।
आओ, नाचो, खुशी मनाओ,
आज दिवाली रे।
दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।
ऋतुएँ
सूरज तपता धरती जलती।
गरम हवा ज़ोरों से चलती।
तन से बहुत पसीना बहता,
हाथ सभी के पंखा रहता।
आ रे बादल! काल्रे बादल!
गरमी दूर भगा रे बादल!
रिमझिम बूँदें बरसा बादल!
झम-झम पानी बरसा बादल!
लो घनघोर घटाएँ छाईं,
टप-टप-टप-टप बूँदें आईं।
बिजली चमक रही अब चम-चम,
लगा बरसने पानी झम-झम!
लेकर अपने साथ दिवाली,
सरदी आई बड़ी निराली।
शाम सवेरे सरदी लगती,
पर स्वेटर से है वह भगती।
सरदी जाती, गरमी आती,
रंग रंग के फूल खिलाती।
रंग-रँगीली होली आती,
सबके मन उमंग भर जाती।
रात और दिन हुए बराबर,
सोते लोग निकलकर बाहर।
सरदी बिलकुल नहीं सताती,
सरदी जाती गरमी आती।
गरम हवा ज़ोरों से चलती।
तन से बहुत पसीना बहता,
हाथ सभी के पंखा रहता।
आ रे बादल! काल्रे बादल!
गरमी दूर भगा रे बादल!
रिमझिम बूँदें बरसा बादल!
झम-झम पानी बरसा बादल!
लो घनघोर घटाएँ छाईं,
टप-टप-टप-टप बूँदें आईं।
बिजली चमक रही अब चम-चम,
लगा बरसने पानी झम-झम!
लेकर अपने साथ दिवाली,
सरदी आई बड़ी निराली।
शाम सवेरे सरदी लगती,
पर स्वेटर से है वह भगती।
सरदी जाती, गरमी आती,
रंग रंग के फूल खिलाती।
रंग-रँगीली होली आती,
सबके मन उमंग भर जाती।
रात और दिन हुए बराबर,
सोते लोग निकलकर बाहर।
सरदी बिलकुल नहीं सताती,
सरदी जाती गरमी आती।
सीखो by श्रीनाथ सिंह
फूलों से नित हँसना सीखो,
भौंरों से नित गाना।
तरु की झुकी डालियों से नित
सीखो शीश झुकाना।
सीख हवा के झोंकों से लो
कोमल भाव बहाना।
दूध तथा पानी से सीखो
मिलना और मिलाना।
सूरज की किरणों से सीखो
जगना और जगाना।
लता और पेड़ों से सीखो
सबको गले लगाना।
मछली से सीखो स्वदेश के
लिए तड़पकर मरना।
पतझड़ के पेड़ों से सीखो
दुख में धीरज धरना।
दीपक से सीखो जितना
हो सके अँधेरा हरना।
पृथ्वी से सीखो प्राणी की
सच्ची सेवा करना।
जलधारा से सीखो आगे
जीवन-पथ में बढ़ना।
और धुँए से सीखो हरदम
ऊँचे ही पर चड़ना।
भौंरों से नित गाना।
तरु की झुकी डालियों से नित
सीखो शीश झुकाना।
सीख हवा के झोंकों से लो
कोमल भाव बहाना।
दूध तथा पानी से सीखो
मिलना और मिलाना।
सूरज की किरणों से सीखो
जगना और जगाना।
लता और पेड़ों से सीखो
सबको गले लगाना।
मछली से सीखो स्वदेश के
लिए तड़पकर मरना।
पतझड़ के पेड़ों से सीखो
दुख में धीरज धरना।
दीपक से सीखो जितना
हो सके अँधेरा हरना।
पृथ्वी से सीखो प्राणी की
सच्ची सेवा करना।
जलधारा से सीखो आगे
जीवन-पथ में बढ़ना।
और धुँए से सीखो हरदम
ऊँचे ही पर चड़ना।
सुबह by श्रीप्रसाद
सूरज की किरणें आती हैं,
सारी कलियाँ खिल जाती हैं,
अंधकार सब खो जाता है,
सब जग सुंदर हो जाता है।
चिड़ियाँ गाती हैं मिलजुल कर,
बहते हैं उनके मीठे स्वर,
ठंडी-ठंडी हवा सुहानी,
चलती है जैसे मस्तानी।
य प्रातः की सुख-बेला है,
धरती का सुख अलबेला है,
नई ताज़गी, नई कहानी,
नया जोश पाते हैं प्राणी।
खो देते हैं आलस सारा,
और काम लगता है प्यारा,
सुबह भली लगती है उनको,
मेहनत प्यारी लगती जिनको।
मेहनत सबसे अच्छा गुण है,
आलस बहुत बड़ा दुर्गुण है,
अगर सुबह भी अलसा जाए,
तो क्या जग सुंदर हो पाए?
सारी कलियाँ खिल जाती हैं,
अंधकार सब खो जाता है,
सब जग सुंदर हो जाता है।
चिड़ियाँ गाती हैं मिलजुल कर,
बहते हैं उनके मीठे स्वर,
ठंडी-ठंडी हवा सुहानी,
चलती है जैसे मस्तानी।
य प्रातः की सुख-बेला है,
धरती का सुख अलबेला है,
नई ताज़गी, नई कहानी,
नया जोश पाते हैं प्राणी।
खो देते हैं आलस सारा,
और काम लगता है प्यारा,
सुबह भली लगती है उनको,
मेहनत प्यारी लगती जिनको।
मेहनत सबसे अच्छा गुण है,
आलस बहुत बड़ा दुर्गुण है,
अगर सुबह भी अलसा जाए,
तो क्या जग सुंदर हो पाए?
बढ़े चलो by द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।
हाथ में ध्वजा रहे,
बाल-दल सजा रहे,
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।
सामने पहाड़ हो,
सिंह की दहाड़ हो,
तुम निडर, हटो नहीं,
तुम निडर, डटो वहीं,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।
मेघ गरजते रहें,
मेघ बरसते रहें,
बिजलियाँ कड़क उठें,
बिजलियाँ तड़क उठें,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।
प्रात हो कि रात हो,
संग हो न साथ हो,
सूर्य-से बढ़े चलो,
चंद्र-से बढ़े चलो,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।
धीर, तुम बढ़े चलो।
हाथ में ध्वजा रहे,
बाल-दल सजा रहे,
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।
सामने पहाड़ हो,
सिंह की दहाड़ हो,
तुम निडर, हटो नहीं,
तुम निडर, डटो वहीं,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।
मेघ गरजते रहें,
मेघ बरसते रहें,
बिजलियाँ कड़क उठें,
बिजलियाँ तड़क उठें,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।
प्रात हो कि रात हो,
संग हो न साथ हो,
सूर्य-से बढ़े चलो,
चंद्र-से बढ़े चलो,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।
पंचवटी-प्रसंग by मैथिलीशरण गुप्त
चारु चंद्र की चंचल किरणें
खेल रही हैं जल-थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है,
अवनि और अंबर-तल में।
पुलक प्रकट करती है धरती,
हरित तृणों की नोकों से,
मानो झूम रहे हैं तरु भी
मंद पवन के झोंखों से ।।१।।
पंचवटी की छाया में है
सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
उसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर,
धीर, वीर, निर्भीक बना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर,
जब कि भुवन-भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा
बना दृष्टिगत होता है ।।२।।
किस व्रत में है व्रती वीर यह
निद्रा का यों त्याग किए?
राज-भोग के योग्य विपिन में
बैठा आज विराग लिए?
बना हुआ है प्रहरी जिसका
उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका
तन है, मन है, जीवन है ।।३।।
मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने
स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह
कुटी आज अपनाई है,
वीर-वंश की लाज यही है,
फिर क्यों वीर न हो प्रहरी?
विजन देश है, निशा शेष है
निशाचरी माया ठहरी ।।४।।
कोई पास न रहने पर भी
जन-मन मौन नहीं रहता,
आप आपकी सुनता है वह,
आप आपसे है कहता।
बीच-बीच में इधर-उधर निज
दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन-ही-मन बातें करता है
वीर धनुर्धर नई-नई ।।५।।
क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह,
है क्या ही निस्तब्ध निशा,
है स्वच्छंद सुमंद गंधवह
निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं,
नियति-नटी के कार्यकलाप,
पर कितने एकांत-भाव से,
कितने शांत और चुपचाप ।।६।।
है बिखेर देती वसुन्धरा
मोती, सबके सोने पर;
रवि बटोर लेता है उनको
सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी
संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम तनु जिससे उसका,
नया रूप झलकाता है ।।७।।
सरल तरल जिन तुहिन कणों से
हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे
साथ उन्हीं से रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह
अदय दंड तो देती है,
पर बूढ़ों को भी बच्चों-सा
सदय भाव से सेती है ।।८।।
तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके
पर है मानो कल की बात!
वन को आते देख हमें जब
आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है
जब अवधि पूर्ण होगी वन की,
किन्तु प्राप्ति होगी इन जन को
इससे बढ़कर किस धन की ।।९।।
और आर्य को? राज्यभार तो
वे प्रजार्थ ही धारेंगे;
व्यस्त रहेंगे, हम सबको भी
मानो विवश बिसारेंगे!
कर विचार लोकोपकार का
हमें न इससे होगा शोक,
पर अपना हित आप नहीं क्या
कर सकता है यह नरलोक ।।१०।।
होता यदि राजत्व मात्र ही
लक्ष्य हमारे जीवन का,
तो क्यों अपने पूर्वज उसको
छोड़ मार्ग लेते वन का?
परिवर्तन ही यदि उन्नति है
तो हम बढ़ते जाते हैं,
किन्तु मुझे तो सीधे-सच्चे
पूर्व-भाव ही भाते हैं ।। ११।।
खेल रही हैं जल-थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है,
अवनि और अंबर-तल में।
पुलक प्रकट करती है धरती,
हरित तृणों की नोकों से,
मानो झूम रहे हैं तरु भी
मंद पवन के झोंखों से ।।१।।
पंचवटी की छाया में है
सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
उसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर,
धीर, वीर, निर्भीक बना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर,
जब कि भुवन-भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा
बना दृष्टिगत होता है ।।२।।
किस व्रत में है व्रती वीर यह
निद्रा का यों त्याग किए?
राज-भोग के योग्य विपिन में
बैठा आज विराग लिए?
बना हुआ है प्रहरी जिसका
उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका
तन है, मन है, जीवन है ।।३।।
मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने
स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह
कुटी आज अपनाई है,
वीर-वंश की लाज यही है,
फिर क्यों वीर न हो प्रहरी?
विजन देश है, निशा शेष है
निशाचरी माया ठहरी ।।४।।
कोई पास न रहने पर भी
जन-मन मौन नहीं रहता,
आप आपकी सुनता है वह,
आप आपसे है कहता।
बीच-बीच में इधर-उधर निज
दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन-ही-मन बातें करता है
वीर धनुर्धर नई-नई ।।५।।
क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह,
है क्या ही निस्तब्ध निशा,
है स्वच्छंद सुमंद गंधवह
निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं,
नियति-नटी के कार्यकलाप,
पर कितने एकांत-भाव से,
कितने शांत और चुपचाप ।।६।।
है बिखेर देती वसुन्धरा
मोती, सबके सोने पर;
रवि बटोर लेता है उनको
सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी
संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम तनु जिससे उसका,
नया रूप झलकाता है ।।७।।
सरल तरल जिन तुहिन कणों से
हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे
साथ उन्हीं से रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह
अदय दंड तो देती है,
पर बूढ़ों को भी बच्चों-सा
सदय भाव से सेती है ।।८।।
तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके
पर है मानो कल की बात!
वन को आते देख हमें जब
आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है
जब अवधि पूर्ण होगी वन की,
किन्तु प्राप्ति होगी इन जन को
इससे बढ़कर किस धन की ।।९।।
और आर्य को? राज्यभार तो
वे प्रजार्थ ही धारेंगे;
व्यस्त रहेंगे, हम सबको भी
मानो विवश बिसारेंगे!
कर विचार लोकोपकार का
हमें न इससे होगा शोक,
पर अपना हित आप नहीं क्या
कर सकता है यह नरलोक ।।१०।।
होता यदि राजत्व मात्र ही
लक्ष्य हमारे जीवन का,
तो क्यों अपने पूर्वज उसको
छोड़ मार्ग लेते वन का?
परिवर्तन ही यदि उन्नति है
तो हम बढ़ते जाते हैं,
किन्तु मुझे तो सीधे-सच्चे
पूर्व-भाव ही भाते हैं ।। ११।।
Friday, July 3, 2009
आशा का दीपक by रामधारी सिंह 'दिनकर'
वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
चिनगारी बन गई लहू की बूँद गिरी जो पग से,
चमक रहे, पीछे मुड़ देखो, चरण-चिह्न जगमग-से।
शुरू हुई आराध्य-भूमि यह, क्लांति नहीं रे राही,
और नहीं तो पाँव लगे हैं क्यों पड़ने डगमग-से?
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दु:ख झेलते कुलिश निर्मम का।
एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ,
वह देखो, उस पार चमकता है मंदिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य=प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही,
अंबर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
चिनगारी बन गई लहू की बूँद गिरी जो पग से,
चमक रहे, पीछे मुड़ देखो, चरण-चिह्न जगमग-से।
शुरू हुई आराध्य-भूमि यह, क्लांति नहीं रे राही,
और नहीं तो पाँव लगे हैं क्यों पड़ने डगमग-से?
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दु:ख झेलते कुलिश निर्मम का।
एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ,
वह देखो, उस पार चमकता है मंदिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य=प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही,
अंबर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
सरिता का जल by गोपाल सिंह नेपालि
यह लघु सरिता का बहता जल,
कितना शीतल, कितना निर्मल।
हिमगिरि के हिम से निकल-निकल,
यह विमल दूध-सा हिम का जल,
कर-कर निनाद कलकल छलछल,
बहता आता नीचे पल-पल।
तन का चंचल, मन का विह्वल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
निर्मल जल का यह तेज़ धार,
करके कितनी शृंखला पार,
बहती रहती है लगातार,
गिरती-उठती है बार-बार।
रखता है तन में इतना बल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
एकांत प्रांत निर्जन-निर्जन,
यह वसुधा के हिमगिरि का वन,
रहता मंजुल मुखरित क्षण-क्षण,
लगता जैसे नंदन-कानन।
करता है जंगल में मंगल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
करके तरु-मूलों का सिंचन,
लघु जल-धारों से आलिंगन,
जल-कुंडों में करके नर्तन,
करके अपना बहु परिवर्तन।
आगे बढ़ता जाता केवल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
ऊँचे शिखरों से उतर-उतर,
गिर-गिर गिरि के चट्टानों पर,
कंकड़-कंकड़ पैदल चलकर,
दिनभर, रजनीभर, जीवनभर।
धोता वसुधा का अंतस्तल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
मिलता है इसको जब पथ पर,
पथ रोके खड़ा कठिन पत्थर,
आकुल, आतुर, दु:ख से कातर,
सिर पटक-पटककर रो-रोकर।
करता है कितना कोलाहल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
हिम के पत्थर वे पिघल-पिघल,
बन गए धरा का घारि विमल,
सुख पाता जिससे पथिक विकल,
पी-पीकर अंजलिभर मृदु जल।
नित जलकर भी कितना शीतल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
कितना कोमल, कितना वत्सल,
रे, जननी का वह अंतस्तल!
जिसका यह शीतल करुणाजल,
बहता रहता युग-युग अविरल।
गंगा, यमुना, सरयू निर्मल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
कितना शीतल, कितना निर्मल।
हिमगिरि के हिम से निकल-निकल,
यह विमल दूध-सा हिम का जल,
कर-कर निनाद कलकल छलछल,
बहता आता नीचे पल-पल।
तन का चंचल, मन का विह्वल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
निर्मल जल का यह तेज़ धार,
करके कितनी शृंखला पार,
बहती रहती है लगातार,
गिरती-उठती है बार-बार।
रखता है तन में इतना बल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
एकांत प्रांत निर्जन-निर्जन,
यह वसुधा के हिमगिरि का वन,
रहता मंजुल मुखरित क्षण-क्षण,
लगता जैसे नंदन-कानन।
करता है जंगल में मंगल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
करके तरु-मूलों का सिंचन,
लघु जल-धारों से आलिंगन,
जल-कुंडों में करके नर्तन,
करके अपना बहु परिवर्तन।
आगे बढ़ता जाता केवल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
ऊँचे शिखरों से उतर-उतर,
गिर-गिर गिरि के चट्टानों पर,
कंकड़-कंकड़ पैदल चलकर,
दिनभर, रजनीभर, जीवनभर।
धोता वसुधा का अंतस्तल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
मिलता है इसको जब पथ पर,
पथ रोके खड़ा कठिन पत्थर,
आकुल, आतुर, दु:ख से कातर,
सिर पटक-पटककर रो-रोकर।
करता है कितना कोलाहल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
हिम के पत्थर वे पिघल-पिघल,
बन गए धरा का घारि विमल,
सुख पाता जिससे पथिक विकल,
पी-पीकर अंजलिभर मृदु जल।
नित जलकर भी कितना शीतल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
कितना कोमल, कितना वत्सल,
रे, जननी का वह अंतस्तल!
जिसका यह शीतल करुणाजल,
बहता रहता युग-युग अविरल।
गंगा, यमुना, सरयू निर्मल।
यह लघु सरिता का बहता जल।
तुम कल्पना करो by गोपाल सिंह नेपालि
तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,
तुम कल्पना करो।
१) अब घिस गई समाज की तमाम नीतियाँ,
अब घिस गई मनुष्य की अतीत रीतियाँ,
हैं दे रही चुनौतियाँ तुम्हें कुरीतियाँ,
निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिए,
तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,
तुम कल्पना करो।
२) ज़ंजीर टूटती कभी न अश्रु-धार से,
दु:ख-दर्द दूर भागते नहीं दुलार से,
हटती न दासता पुकार से, गुहार से,
इस गंग-तीर बैठ आज राष्ट्र-शक्ति की,
तुम कामना करो किशोर, कामना करो,
तुम कामना करो।
३) जो तुम गए, स्वदेश की जवानियाँ गईं,
चित्तौर के 'प्रताप' की कहानियाँ गईं,
आज़ाद देश-रक्त की रवानियाँ गईं,
अब सूर्य-चंद्र से समृद्धि ऋद्धि-सिद्धि की,
तुम याचना करो दरिद्र, याचना करो,
तुम याचना करो।
४) जिसकी तरंग लोल हैं अशांत सिन्धु वह,
जो काटता घटा प्रगाढ़ वक्र इन्दु वह,
जो मापता समय सृष्टि-दृष्टि बिन्दु वह,
वह है मनुष्य जो स्वदेश की व्यथा हरे,
तुम यातना हरो मनुष्य, यातना हरो,
तुम यातना हरो।
५) तुम प्रार्थना किए चले, नहीं दिशा हिली,
तुम साधना किए चले, नहीं निशा हिली,
इस आर्त दीन देश की न दुर्दशा हिली,
अब अश्रु-धार छोड़ आज शीश-दान से,
तुम अर्चना करो, अमोघ अर्चना करो,
तुम अर्चना करो।
६) आकाश है स्वतंत्र, है स्वतंत्र मेखला,
यह शृंग भी स्वतंत्र ही खड़ा, बना, ढला,
है जलप्रपात काटता सदैव शृंखला,
आनन्द-शोक जन्म और मृत्यु के लिए,
तुम योजना करो, स्वतंत्र योजना करो,
तुम योजना करो।
तुम कल्पना करो।
१) अब घिस गई समाज की तमाम नीतियाँ,
अब घिस गई मनुष्य की अतीत रीतियाँ,
हैं दे रही चुनौतियाँ तुम्हें कुरीतियाँ,
निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिए,
तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,
तुम कल्पना करो।
२) ज़ंजीर टूटती कभी न अश्रु-धार से,
दु:ख-दर्द दूर भागते नहीं दुलार से,
हटती न दासता पुकार से, गुहार से,
इस गंग-तीर बैठ आज राष्ट्र-शक्ति की,
तुम कामना करो किशोर, कामना करो,
तुम कामना करो।
३) जो तुम गए, स्वदेश की जवानियाँ गईं,
चित्तौर के 'प्रताप' की कहानियाँ गईं,
आज़ाद देश-रक्त की रवानियाँ गईं,
अब सूर्य-चंद्र से समृद्धि ऋद्धि-सिद्धि की,
तुम याचना करो दरिद्र, याचना करो,
तुम याचना करो।
४) जिसकी तरंग लोल हैं अशांत सिन्धु वह,
जो काटता घटा प्रगाढ़ वक्र इन्दु वह,
जो मापता समय सृष्टि-दृष्टि बिन्दु वह,
वह है मनुष्य जो स्वदेश की व्यथा हरे,
तुम यातना हरो मनुष्य, यातना हरो,
तुम यातना हरो।
५) तुम प्रार्थना किए चले, नहीं दिशा हिली,
तुम साधना किए चले, नहीं निशा हिली,
इस आर्त दीन देश की न दुर्दशा हिली,
अब अश्रु-धार छोड़ आज शीश-दान से,
तुम अर्चना करो, अमोघ अर्चना करो,
तुम अर्चना करो।
६) आकाश है स्वतंत्र, है स्वतंत्र मेखला,
यह शृंग भी स्वतंत्र ही खड़ा, बना, ढला,
है जलप्रपात काटता सदैव शृंखला,
आनन्द-शोक जन्म और मृत्यु के लिए,
तुम योजना करो, स्वतंत्र योजना करो,
तुम योजना करो।
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