Sunday, July 5, 2009

बढ़े चलो by द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी

वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।

हाथ में ध्वजा रहे,
बाल-दल सजा रहे,
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।

सामने पहाड़ हो,
सिंह की दहाड़ हो,
तुम निडर, हटो नहीं,
तुम निडर, डटो वहीं,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।

मेघ गरजते रहें,
मेघ बरसते रहें,
बिजलियाँ कड़क उठें,
बिजलियाँ तड़क उठें,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।

प्रात हो कि रात हो,
संग हो न साथ हो,
सूर्य-से बढ़े चलो,
चंद्र-से बढ़े चलो,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।

2 comments:

  1. amazing collection.... which class was this ??

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  2. Robby: This was probably sixth, seventh or eighth.

    - Porcupyn

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