सूरज तपता धरती जलती।
गरम हवा ज़ोरों से चलती।
तन से बहुत पसीना बहता,
हाथ सभी के पंखा रहता।
आ रे बादल! काल्रे बादल!
गरमी दूर भगा रे बादल!
रिमझिम बूँदें बरसा बादल!
झम-झम पानी बरसा बादल!
लो घनघोर घटाएँ छाईं,
टप-टप-टप-टप बूँदें आईं।
बिजली चमक रही अब चम-चम,
लगा बरसने पानी झम-झम!
लेकर अपने साथ दिवाली,
सरदी आई बड़ी निराली।
शाम सवेरे सरदी लगती,
पर स्वेटर से है वह भगती।
सरदी जाती, गरमी आती,
रंग रंग के फूल खिलाती।
रंग-रँगीली होली आती,
सबके मन उमंग भर जाती।
रात और दिन हुए बराबर,
सोते लोग निकलकर बाहर।
सरदी बिलकुल नहीं सताती,
सरदी जाती गरमी आती।
Sunday, July 5, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment