Sunday, July 5, 2009

पंचवटी-प्रसंग by मैथिलीशरण गुप्त

चारु चंद्र की चंचल किरणें
खेल रही हैं जल-थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है,
अवनि और अंबर-तल में।
पुलक प्रकट करती है धरती,
हरित तृणों की नोकों से,
मानो झूम रहे हैं तरु भी
मंद पवन के झोंखों से ।।१।।

पंचवटी की छाया में है
सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
उसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर,
धीर, वीर, निर्भीक बना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर,
जब कि भुवन-भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा
बना दृष्टिगत होता है ।।२।।

किस व्रत में है व्रती वीर यह
निद्रा का यों त्याग किए?
राज-भोग के योग्य विपिन में
बैठा आज विराग लिए?
बना हुआ है प्रहरी जिसका
उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका
तन है, मन है, जीवन है ।।३।।

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने
स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह
कुटी आज अपनाई है,
वीर-वंश की लाज यही है,
फिर क्यों वीर न हो प्रहरी?
विजन देश है, निशा शेष है
निशाचरी माया ठहरी ।।४।।

कोई पास न रहने पर भी
जन-मन मौन नहीं रहता,
आप आपकी सुनता है वह,
आप आपसे है कहता।
बीच-बीच में इधर-उधर निज
दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन-ही-मन बातें करता है
वीर धनुर्धर नई-नई ।।५।।

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह,
है क्या ही निस्तब्ध निशा,
है स्वच्छंद सुमंद गंधवह
निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं,
नियति-नटी के कार्यकलाप,
पर कितने एकांत-भाव से,
कितने शांत और चुपचाप ।।६।।

है बिखेर देती वसुन्धरा
मोती, सबके सोने पर;
रवि बटोर लेता है उनको
सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी
संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम तनु जिससे उसका,
नया रूप झलकाता है ।।७।।

सरल तरल जिन तुहिन कणों से
हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे
साथ उन्हीं से रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह
अदय दंड तो देती है,
पर बूढ़ों को भी बच्चों-सा
सदय भाव से सेती है ।।८।।

तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके
पर है मानो कल की बात!
वन को आते देख हमें जब
आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है
जब अवधि पूर्ण होगी वन की,
किन्तु प्राप्ति होगी इन जन को
इससे बढ़कर किस धन की ।।९।।

और आर्य को? राज्यभार तो
वे प्रजार्थ ही धारेंगे;
व्यस्त रहेंगे, हम सबको भी
मानो विवश बिसारेंगे!
कर विचार लोकोपकार का
हमें न इससे होगा शोक,
पर अपना हित आप नहीं क्या
कर सकता है यह नरलोक ।।१०।।

होता यदि राजत्व मात्र ही
लक्ष्य हमारे जीवन का,
तो क्यों अपने पूर्वज उसको
छोड़ मार्ग लेते वन का?
परिवर्तन ही यदि उन्नति है
तो हम बढ़ते जाते हैं,
किन्तु मुझे तो सीधे-सच्चे
पूर्व-भाव ही भाते हैं ।। ११।।

2 comments:

  1. thanks for posting these...makes me nostalgic. Was searching for these for long#

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  2. You are welcome. Glad you had fun!

    Sorry for the delay in acknowledging your comment. I don't visit the blog too often.

    - Porcupyn

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