Sunday, May 17, 2009

हमारा देश - सुब्रह्मण्य भारती

चमक रहा उत्तुंग हिमालय, यह नगराज हमारा ही है।
जोड़ नहीं धरती पर जिसका, वह नगराज हमारा ही है।
नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस-धारा,
बहती है क्या कहीं और भी ऐसी पावन कल-कल धारा?
सम्मानित जो सकल विश्व में, महिमा जिनकी बहुत रही है,
अमर ग्रन्थ वे सभी हमारे - उपनिषदों का देश यही है।

गाएँगे यश हम सब इसका, यह है स्वर्णिम देश हमारा।
आगे कौन जगत में हमसे, यह है भारत देश हमारा।
यह है देश हमारा भारत - महारथीगण हुए जहाँ पर,
यह है देश मही का स्वर्णिम - ऋषियों ने तप किए जहाँ पर,
यह है देश, जहाँ नारद के गूँजे मधुमय गान सभी थे,
यह है देश, जहाँ पर बनते सर्वोत्तम सामान सभी थे।

यह है देश हमारा भारत, पूर्ण ज्ञान का शुभ्र निकेतन।
यह है देश, जहाँ पर बरसी बुद्धदेव की करुणा चेतन।
है महान, अति भव्य पुरातन, गूँजेगा यह गान हमारा।
है क्या हमसा कोई जग में, यह है भारत देश हमारा।
विघ्नों का दल चढ़ आए तो उन्हें देख भयभीत न होंगे,
अब न रहेंगे दलित दीन हम, कहीं किसी से हीन न होंगे,

क्षुद्र स्वार्थ की खातिर हम तो कभी न गर्हित कर्म करेंगे,
पुण्यभूमि यह भारतमाता, जग की हम तो भीख न लेंगे।
मिस्री-मधु-मेवा-फल सारे देती हमको सदा यही है,
कदली, चावल, अन्न विविध औ' क्षीर सुधामय लुटा रही है।
आर्यभूमि उत्कर्ष्मयी यह, गूँजेगा यह गान हमारा।
कौन करेगा समता इसकी, महिमामय यह देश हमारा।

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