Sunday, July 5, 2009

पुष्प की अभिलाषा by माखनलाल चतुर्वेदी

चाह नहीं, मैं सुरबेला के
गहनों में गुँथा जाऊँ।
चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ।

चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर, हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ।

मुझे तोड़ लेना, वनमाली,
उस पथ में देना तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जाएँ वीर अनेक।

तितली

दूर देश से आई तितली,
चंचल पंख हिलाती।
फूल-फूल पर, कली-कली पर,
इतराती, इठलाती।

कितने सुंदर हैं पर इसके,
जगमग रंग-रँगीले।
लाल, हरे, बैंजनी, वसन्ती,
काले, नीले, पीले।

बच्चों ने जब देखी इसकी,
खुशियाँ, खेल निराले।
छोड़छाड़ कर खेल-खिलौने,
दौड़ पड़े मतवाले।

अब पकड़ी तब पकड़ी तितली,
कभी पास है आती।
और कभी पर तेज़ हिलाकर,
दूर बहुत उड़ जाती।

बच्चों के भी पर होते तो,
साथ-साथ उड़ जाते।
और हवा में उड़ते-उड़ते,
दूर देश हो आते।

पथ की पहचान by हरिवंश राय 'बच्चन' (excerpted from 'सतरंगिनी)

पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!
पुस्तकों में है नहीं, छपी हुई इसकी कहानी,
हाल इसका ज्ञात होता, है न औरों की ज़बानी,
अनगिनत राही गए इस राह से, उनका पता क्या,
पर गए कुछ लोग इस पर, छोड़ पैरों की निशानी,
यह निशानी, मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है,
खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले!
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!

है अनिश्चित किस जगह पर, सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,
है अनिश्चित किस जगह पर, बाग़ बन सुंदर मिलेंगे,
किस जगह यात्रा ख़तम हो जायगी, यह भी अनिश्चित,
है अनिश्चित, कब सुमन, कब कंटकों के सर मिलेंगे
कौन सहसा छूट जाएँगे, मिलेंगे कौन सहसा,
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा तू न, ऐसी आन कर ले :
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!

कौन कहता है कि स्वप्नों को न आने दे हृदय में,
देखते सब हैं इन्हें, अपनी उमर, अपने समय में,
और तू कर यत्न भी तो, मिल नहीं सकती सफलता,
ये उदय होते लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में,
किन्तु जग के पंथ पर यदि, स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो, सत्य का भी ज्ञान कर ले :
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!

स्वप्न आता स्वर्ग का, दृग-कोरकों में दीप्ति आती,
पंख लग जाते पगों को, ललकती उन्मुक्त छाती,
रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता,
रक्त की दो बूँद गिरतीं, एक दुनिया डूब जाती,
आँख में हो स्वर्ग लेकिन, पाँव पृथ्वी पर टिके हों,
कंटकों की इस अनोखी सीख का सम्मान कर ले,
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले!

यह बुरा है या कि अच्छा व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
जब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना,
तू इसे अच्छा समझ, यात्रा सरल इससे बनेगी,
सोच मत केवल तुझे ही यह बड़ा मन में बिठाना,
हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर पड़ा है,
तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के, बटोही, बाट की पहचान कर ले।

दीप जलाओ, दीप जलाओ

दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।
खुशी-खुसी सब हँसते आओ,
आज दिवाली रे।

मैं तो लूँगा खील-खिलौने,
तुम भी लेना भाई।
नाचो, गाओ, खुशी मनाओ,
आज दिवाली आई।

आज पटाखे खूब चलाओ
आज दिवाली रे।
दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।

नए-नए मैं कपड़े पहनूँ,
खाऊँ खूब मिठाई।
हाथ जोड़कर पूजा कर लूँ
आज दिवाली आई।

खाओ मित्रो, खूब मिठाई,
आज दिवाली रे।
दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।

आज दुकानें खूब सजी हैं,
घर भी जगमग करते।
झलमल-झलमल दीप जले हैं
कितने अच्छे लगते।

आओ, नाचो, खुशी मनाओ,
आज दिवाली रे।
दीप जलाओ, दीप जलाओ,
आज दिवाली रे।

ऋतुएँ

सूरज तपता धरती जलती।
गरम हवा ज़ोरों से चलती।
तन से बहुत पसीना बहता,
हाथ सभी के पंखा रहता।

आ रे बादल! काल्रे बादल!
गरमी दूर भगा रे बादल!
रिमझिम बूँदें बरसा बादल!
झम-झम पानी बरसा बादल!

लो घनघोर घटाएँ छाईं,
टप-टप-टप-टप बूँदें आईं।
बिजली चमक रही अब चम-चम,
लगा बरसने पानी झम-झम!

लेकर अपने साथ दिवाली,
सरदी आई बड़ी निराली।
शाम सवेरे सरदी लगती,
पर स्वेटर से है वह भगती।

सरदी जाती, गरमी आती,
रंग रंग के फूल खिलाती।
रंग-रँगीली होली आती,
सबके मन उमंग भर जाती।

रात और दिन हुए बराबर,
सोते लोग निकलकर बाहर।
सरदी बिलकुल नहीं सताती,
सरदी जाती गरमी आती।

सीखो by श्रीनाथ सिंह

फूलों से नित हँसना सीखो,
भौंरों से नित गाना।
तरु की झुकी डालियों से नित
सीखो शीश झुकाना।

सीख हवा के झोंकों से लो
कोमल भाव बहाना।
दूध तथा पानी से सीखो
मिलना और मिलाना।

सूरज की किरणों से सीखो
जगना और जगाना।
लता और पेड़ों से सीखो
सबको गले लगाना।

मछली से सीखो स्वदेश के
लिए तड़पकर मरना।
पतझड़ के पेड़ों से सीखो
दुख में धीरज धरना।

दीपक से सीखो जितना
हो सके अँधेरा हरना।
पृथ्वी से सीखो प्राणी की
सच्ची सेवा करना।

जलधारा से सीखो आगे
जीवन-पथ में बढ़ना।
और धुँए से सीखो हरदम
ऊँचे ही पर चड़ना।

सुबह by श्रीप्रसाद

सूरज की किरणें आती हैं,
सारी कलियाँ खिल जाती हैं,
अंधकार सब खो जाता है,
सब जग सुंदर हो जाता है।

चिड़ियाँ गाती हैं मिलजुल कर,
बहते हैं उनके मीठे स्वर,
ठंडी-ठंडी हवा सुहानी,
चलती है जैसे मस्तानी।

य प्रातः की सुख-बेला है,
धरती का सुख अलबेला है,
नई ताज़गी, नई कहानी,
नया जोश पाते हैं प्राणी।

खो देते हैं आलस सारा,
और काम लगता है प्यारा,
सुबह भली लगती है उनको,
मेहनत प्यारी लगती जिनको।

मेहनत सबसे अच्छा गुण है,
आलस बहुत बड़ा दुर्गुण है,
अगर सुबह भी अलसा जाए,
तो क्या जग सुंदर हो पाए?

बढ़े चलो by द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी

वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।

हाथ में ध्वजा रहे,
बाल-दल सजा रहे,
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।

सामने पहाड़ हो,
सिंह की दहाड़ हो,
तुम निडर, हटो नहीं,
तुम निडर, डटो वहीं,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।

मेघ गरजते रहें,
मेघ बरसते रहें,
बिजलियाँ कड़क उठें,
बिजलियाँ तड़क उठें,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।

प्रात हो कि रात हो,
संग हो न साथ हो,
सूर्य-से बढ़े चलो,
चंद्र-से बढ़े चलो,
वीर, तुम बढ़े चलो,
धीर, तुम बढ़े चलो।

पंचवटी-प्रसंग by मैथिलीशरण गुप्त

चारु चंद्र की चंचल किरणें
खेल रही हैं जल-थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है,
अवनि और अंबर-तल में।
पुलक प्रकट करती है धरती,
हरित तृणों की नोकों से,
मानो झूम रहे हैं तरु भी
मंद पवन के झोंखों से ।।१।।

पंचवटी की छाया में है
सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
उसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर,
धीर, वीर, निर्भीक बना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर,
जब कि भुवन-भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा
बना दृष्टिगत होता है ।।२।।

किस व्रत में है व्रती वीर यह
निद्रा का यों त्याग किए?
राज-भोग के योग्य विपिन में
बैठा आज विराग लिए?
बना हुआ है प्रहरी जिसका
उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका
तन है, मन है, जीवन है ।।३।।

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने
स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह
कुटी आज अपनाई है,
वीर-वंश की लाज यही है,
फिर क्यों वीर न हो प्रहरी?
विजन देश है, निशा शेष है
निशाचरी माया ठहरी ।।४।।

कोई पास न रहने पर भी
जन-मन मौन नहीं रहता,
आप आपकी सुनता है वह,
आप आपसे है कहता।
बीच-बीच में इधर-उधर निज
दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन-ही-मन बातें करता है
वीर धनुर्धर नई-नई ।।५।।

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह,
है क्या ही निस्तब्ध निशा,
है स्वच्छंद सुमंद गंधवह
निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं,
नियति-नटी के कार्यकलाप,
पर कितने एकांत-भाव से,
कितने शांत और चुपचाप ।।६।।

है बिखेर देती वसुन्धरा
मोती, सबके सोने पर;
रवि बटोर लेता है उनको
सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी
संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम तनु जिससे उसका,
नया रूप झलकाता है ।।७।।

सरल तरल जिन तुहिन कणों से
हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे
साथ उन्हीं से रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह
अदय दंड तो देती है,
पर बूढ़ों को भी बच्चों-सा
सदय भाव से सेती है ।।८।।

तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके
पर है मानो कल की बात!
वन को आते देख हमें जब
आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है
जब अवधि पूर्ण होगी वन की,
किन्तु प्राप्ति होगी इन जन को
इससे बढ़कर किस धन की ।।९।।

और आर्य को? राज्यभार तो
वे प्रजार्थ ही धारेंगे;
व्यस्त रहेंगे, हम सबको भी
मानो विवश बिसारेंगे!
कर विचार लोकोपकार का
हमें न इससे होगा शोक,
पर अपना हित आप नहीं क्या
कर सकता है यह नरलोक ।।१०।।

होता यदि राजत्व मात्र ही
लक्ष्य हमारे जीवन का,
तो क्यों अपने पूर्वज उसको
छोड़ मार्ग लेते वन का?
परिवर्तन ही यदि उन्नति है
तो हम बढ़ते जाते हैं,
किन्तु मुझे तो सीधे-सच्चे
पूर्व-भाव ही भाते हैं ।। ११।।

Friday, July 3, 2009

आशा का दीपक by रामधारी सिंह 'दिनकर'

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
चिनगारी बन गई लहू की बूँद गिरी जो पग से,
चमक रहे, पीछे मुड़ देखो, चरण-चिह्न जगमग-से।
शुरू हुई आराध्य-भूमि यह, क्लांति नहीं रे राही,
और नहीं तो पाँव लगे हैं क्यों पड़ने डगमग-से?
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दु:ख झेलते कुलिश निर्मम का।
एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ,
वह देखो, उस पार चमकता है मंदिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य=प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही,
अंबर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

सरिता का जल by गोपाल सिंह नेपालि

यह लघु सरिता का बहता जल,
कितना शीतल, कितना निर्मल।

हिमगिरि के हिम से निकल-निकल,
यह विमल दूध-सा हिम का जल,
कर-कर निनाद कलकल छलछल,
बहता आता नीचे पल-पल।

तन का चंचल, मन का विह्वल।
यह लघु सरिता का बहता जल।

निर्मल जल का यह तेज़ धार,
करके कितनी शृंखला पार,
बहती रहती है लगातार,
गिरती-उठती है बार-बार।

रखता है तन में इतना बल।
यह लघु सरिता का बहता जल।

एकांत प्रांत निर्जन-निर्जन,
यह वसुधा के हिमगिरि का वन,
रहता मंजुल मुखरित क्षण-क्षण,
लगता जैसे नंदन-कानन।

करता है जंगल में मंगल।
यह लघु सरिता का बहता जल।

करके तरु-मूलों का सिंचन,
लघु जल-धारों से आलिंगन,
जल-कुंडों में करके नर्तन,
करके अपना बहु परिवर्तन।

आगे बढ़ता जाता केवल।
यह लघु सरिता का बहता जल।

ऊँचे शिखरों से उतर-उतर,
गिर-गिर गिरि के चट्टानों पर,
कंकड़-कंकड़ पैदल चलकर,
दिनभर, रजनीभर, जीवनभर।

धोता वसुधा का अंतस्तल।
यह लघु सरिता का बहता जल।

मिलता है इसको जब पथ पर,
पथ रोके खड़ा कठिन पत्थर,
आकुल, आतुर, दु:ख से कातर,
सिर पटक-पटककर रो-रोकर।

करता है कितना कोलाहल।
यह लघु सरिता का बहता जल।

हिम के पत्थर वे पिघल-पिघल,
बन गए धरा का घारि विमल,
सुख पाता जिससे पथिक विकल,
पी-पीकर अंजलिभर मृदु जल।

नित जलकर भी कितना शीतल।
यह लघु सरिता का बहता जल।

कितना कोमल, कितना वत्सल,
रे, जननी का वह अंतस्तल!
जिसका यह शीतल करुणाजल,
बहता रहता युग-युग अविरल।

गंगा, यमुना, सरयू निर्मल।
यह लघु सरिता का बहता जल।

तुम कल्पना करो by गोपाल सिंह नेपालि

तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,
तुम कल्पना करो।

१) अब घिस गई समाज की तमाम नीतियाँ,
अब घिस गई मनुष्य की अतीत रीतियाँ,
हैं दे रही चुनौतियाँ तुम्हें कुरीतियाँ,
निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिए,
तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,
तुम कल्पना करो।

२) ज़ंजीर टूटती कभी न अश्रु-धार से,
दु:ख-दर्द दूर भागते नहीं दुलार से,
हटती न दासता पुकार से, गुहार से,
इस गंग-तीर बैठ आज राष्ट्र-शक्ति की,
तुम कामना करो किशोर, कामना करो,
तुम कामना करो।

३) जो तुम गए, स्वदेश की जवानियाँ गईं,
चित्तौर के 'प्रताप' की कहानियाँ गईं,
आज़ाद देश-रक्त की रवानियाँ गईं,
अब सूर्य-चंद्र से समृद्धि ऋद्धि-सिद्धि की,
तुम याचना करो दरिद्र, याचना करो,
तुम याचना करो।

४) जिसकी तरंग लोल हैं अशांत सिन्धु वह,
जो काटता घटा प्रगाढ़ वक्र इन्दु वह,
जो मापता समय सृष्टि-दृष्टि बिन्दु वह,
वह है मनुष्य जो स्वदेश की व्यथा हरे,
तुम यातना हरो मनुष्य, यातना हरो,
तुम यातना हरो।

५) तुम प्रार्थना किए चले, नहीं दिशा हिली,
तुम साधना किए चले, नहीं निशा हिली,
इस आर्त दीन देश की न दुर्दशा हिली,
अब अश्रु-धार छोड़ आज शीश-दान से,
तुम अर्चना करो, अमोघ अर्चना करो,
तुम अर्चना करो।

६) आकाश है स्वतंत्र, है स्वतंत्र मेखला,
यह शृंग भी स्वतंत्र ही खड़ा, बना, ढला,
है जलप्रपात काटता सदैव शृंखला,
आनन्द-शोक जन्म और मृत्यु के लिए,
तुम योजना करो, स्वतंत्र योजना करो,
तुम योजना करो।

Sunday, May 17, 2009

माँ, कह एक कहानी! by मैथिली शरन गुप्त

"माँ, कह एक कहानी!"

"बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी?
कह माँ, कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी? माँ, कह एक कहानी।"

"तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी।"
"जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ, यही कहानी।"

"वर्ण-वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिन्दु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।"
"लहराता था पानी! हाँ, हाँ, यही कहानी।"

"गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्ष की कानी!"
"हुई पक्ष की हानी? करुणा-भरी कहानी!"

"चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया।
इतने में आखेटक आया, लक्ष्य-सिद्धि का मानी।"
"लक्ष्य-सिद्धि का मानी! कोमल-कठिन कहानी।"

"माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी।
तब उसने, जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।"
"हठ करने की ठनी! अब बढ़ चली कहानी।"

"हुआ विवाद सदय-निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गई बात तब न्यायालय में, सुनी सभी ने जानी।"
"सुनी सभी ने जानी! व्यापक हुई कहानी।"

"राहुल, तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?"
"माँ, मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।
कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य न उसे उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे न्याय दया का दानी."

"न्याय दया का दानी! तूने गुनी कहानी।"

Mother, tell me a tale
Hindi poem by Mythili Sharan Gupta
Translated by C.P. Ravikumar

Mother, tell me a tale!

What do you take me for, my son,
Your grandmother? Pray tell?

You are the daughter, says my nanny,
Of none other than sweet old Granny.
So, mother, while we lie down, tell me,
Tell me a magical fairy tale
That makes granny's story pale!

O you are a stubborn one my lad,
The story begins with your dad,
As he, in his royal dresses clad,
Went for a walk in the morning gale.

My father's own boyhood tale?
Now that's my kind of fairy tale!

There were blossoms everywhere,
The smell of spring was in the air,
And hidden in the morning's misty veil,
gently cooed a nightingale.

Gently cooed a nightingale!
I would like to hear this tale!

Squirrels nibbled on fallen acorn,
O it was a picture-perfect morn,
Until a swan from the sky fell down,
Shot by an arrow in its tail.

Shot by an arrow in its tail!
Mother, what a woeful tale!

Alarmed, your father picked up the swan.
He nursed her, and the bird was reborn.
She slowly opened her eyes forlorn,
Only to hear the hunter on trail!

The hunter was still on the trail!
What happened then? Quickly unveil!

He said : Give me the bird, she's my mark!
Your father, the protector, did not hark.
The hunter, in his mood to lark,
Was not willing to loose or fail!

He wanted to seize the swan so frail?
Curiouser and curiouser get this tale!

It was a battle of cruelty and kindness,
Both equally powerful forces.
They took the case to court of justice,
where it went on a public trial!

Seriouser and seriouser gets this tale!
What happened Ma? Did justice prevail?

What happened next, I will not say.
Rahul, can you be the judge today?

Mother, who am I to judge a case?
I am just a kid with an innocent face!
But this much even I can tell,
if one can harm a harmless soul,
how is saving a fowl a foul?
Let justice be for the kind, I say,
let their kind prosper and prevail!

Rahul, indeed you have judged well!
My child, you got the gist of the tale!

हम पँछी उन्मुक्त गगन के by 'सर्वमंगल'

हम पंछी उन्मुक्त गगन के, पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,
कनक-तीलियों से टकराकर, पुल्कित पँख टूट जाएँगे।

हम बहता जल पीने वाले, मर जाएँगे भूखे-प्यासे,
कहीं भली है कटुक निबौरी, कनक कटौरी की मैदा से।

स्वर्ण-ष्रिन्खला के बन्धन से, अपनी गती उड़ान सब भूले,
बस सपनों में देख रहे हैं, तरु की फुनगी पर के झूले।

ऐसे थे अरमान कि उड़ते, नीले नभ की सीमा पाने,
लाल किरण-सी चोंच खोल, चुगते तारक-अनार के दाने।

होती सीमाहीन क्षितिज से, इन पँखों की होडा-होडी,
या तो क्षितिज मिलन बन जाता, या तनती साँसों की डोरी।

नीड़ न दो, चाहे टहनी का, आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो,
लेकिन पँख दिये हैं तो, आकुल उड़ान मेन विघ्न न डालो।

Translation by C.P. Ravikumar

O we are the birds of the open skies,
We cannot sing cooped up in a cage.
Our fragile wings will crumble down
When they rub against the golden maze.

We, who drink from the flowing brook
Will of thirst and hunger die.
Sweet memories of wild berries n' corn
Will poison the sweetest apple pie.

Captive in these chains of gold,
We have begun to forget how to fly,
Or merrily swing on meadows high ...
O those are dreams of days gone by!

There was a time when we aspired:
Of flying right past the horizon,
Of kissing the rays of the rising sun,
Of nibbling at those twinkling acorn;

We will soar as high as these wings can take,
Toward the zenith which lovingly beckons ...
Either we make it to the very top, or
We breathe our last before it dawns ...

Take away our worldly needs,
Our happy nest you may well destroy,
But pray leave us our wings, and the blue sky;
It's death if we can't flutter and fly ...

हमारा देश - सुब्रह्मण्य भारती

चमक रहा उत्तुंग हिमालय, यह नगराज हमारा ही है।
जोड़ नहीं धरती पर जिसका, वह नगराज हमारा ही है।
नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस-धारा,
बहती है क्या कहीं और भी ऐसी पावन कल-कल धारा?
सम्मानित जो सकल विश्व में, महिमा जिनकी बहुत रही है,
अमर ग्रन्थ वे सभी हमारे - उपनिषदों का देश यही है।

गाएँगे यश हम सब इसका, यह है स्वर्णिम देश हमारा।
आगे कौन जगत में हमसे, यह है भारत देश हमारा।
यह है देश हमारा भारत - महारथीगण हुए जहाँ पर,
यह है देश मही का स्वर्णिम - ऋषियों ने तप किए जहाँ पर,
यह है देश, जहाँ नारद के गूँजे मधुमय गान सभी थे,
यह है देश, जहाँ पर बनते सर्वोत्तम सामान सभी थे।

यह है देश हमारा भारत, पूर्ण ज्ञान का शुभ्र निकेतन।
यह है देश, जहाँ पर बरसी बुद्धदेव की करुणा चेतन।
है महान, अति भव्य पुरातन, गूँजेगा यह गान हमारा।
है क्या हमसा कोई जग में, यह है भारत देश हमारा।
विघ्नों का दल चढ़ आए तो उन्हें देख भयभीत न होंगे,
अब न रहेंगे दलित दीन हम, कहीं किसी से हीन न होंगे,

क्षुद्र स्वार्थ की खातिर हम तो कभी न गर्हित कर्म करेंगे,
पुण्यभूमि यह भारतमाता, जग की हम तो भीख न लेंगे।
मिस्री-मधु-मेवा-फल सारे देती हमको सदा यही है,
कदली, चावल, अन्न विविध औ' क्षीर सुधामय लुटा रही है।
आर्यभूमि उत्कर्ष्मयी यह, गूँजेगा यह गान हमारा।
कौन करेगा समता इसकी, महिमामय यह देश हमारा।

चिड़िया by R.C. Prasad Singh

पीपल की ऊँची डाली पर, बैठी चिड़िया गाती है.
तुम्हें ज्ञात अपनी बोली में, क्या सन्देश सुनाती है?

चिड़िया बैठी प्रेम-प्रीति की, रीति हमें सिखलाती है।
वह जग के बन्दी मानव को, मुक्ति-मन्त्र बतलाती है।
वन में जितने पँछी हैं, खंजन, कपोत, चातक, कोकिल,
काक, हँस, शुक, आदि वास, करते सब आपस में हिलमिल।
सब मिल-जुलकर रहते हैं वे, सब मिल-जुलकर खाते हैं।
आसमान ही उनका घर है, जहाँ चाहते जाते हैं।

रहते जहाँ, वहीं वे अपनी दुनिया एक बसाते हैं।
दिनभर करते काम, रात में पेड़ों पर सो जाते हैं।
उनके मन में लोभ नहीं है, पाप नहीं, परवाह नहीं।
जग का सारा माल हड़पकर जीने की भी चाह नहीं।
जो मिलता है, अपनी श्रम से उतना भर ले लेते हैं।
बच जाता तो औरों के हित, उसे छोड़ वे देते हैं।

सीमा-हीन गगन में उड़ते निर्भय विचरण करते हैं।
नहीं कमाई से औरों की अपना घर वे भरते हैं।
वे कहते हैं - मानव, सीखो तुम हमसे जीना जग में।
हम स्वछंद, और क्यों तुमने डाली है बेड़ी पग में?
तुम देखो हमको, फिर अपनी सोने की कड़ियाँ तोड़ो।
ओ मानव, तुम मानवता से द्रोह-भावना को छोड़ो।

पीपल की डाली पर चिडिया यही सुनाने आती है।
बैठ घडी भर, हमें चकित कर, गाकर फिर उड़ जाती है।

Translated by C.P. Ravikumar

The little sparrow, chirping merrily
Atop the tall peepul tree,
What is it she wants to say?
What message does she convey?

Speaking from the branch above,
The sparrow seems to speak of love,
Of a secret way to get away
From the crowded world-today.

Look at all our feathered friends,
How they stick to each other --
Like one brother to another,
Are these birds of a feather.

They are all a happy family,
They eat together happily.
The whole of blue sky is their home,
Where they are free to fly and roam.

They spread a world, all their own,
Wherever they make their nest;
They work all day and fly back home
As darkness falls, for a good night's rest.

They have no greed, no deep desire,
Their heart is not blackened by sin.
They have no wish to win the world,
Or make the earth around them spin.

Their living hard-earned, paid with sweat,
They will not touch an extra slice:
Someone else could use that piece,
To whom life has not been so nice.

They seem to say these words to man --
Look at us, and you will learn!
Look how free we are, and then
Look at yourself in turn!

You are trapped in a web of gold
That you constantly weave --
Caught in a chain of your own,
you long for freedom, and grieve.

Break your chains, and you will be
Happy as your feathered friends.
Learn to love your fellow men,
You will see how love transcends--

The little sparrow atop the tree,
This is what she seems to say.
Before she busily flies away,
leaving the poet in dismay.

कदम्ब का पेड़

कदम्ब का पेड़ by सुभद्रा कुमारी चौहान

यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे

ले देती यदी मुझे तुम बाँसुरी दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदम्ब की डाली

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता
इस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता

वहीं बैठ फिर बड़े मज़े से मैं बाँसुरी बजाता
अम्मा, अम्मा कह बन्सी के स्वर में तुम्हें बुलाता

सुन मेरी बन्सी को अम्मा, तुम इतनी खुश हो जाती
मुझे देखने, काम छोड़ कर, तुम बाहर को आती

तुमको आते देख बाँसुरी रख मैं चुप हो जाता
वहीं कहीं पत्तों में छुप कर फिर बाँसुरी बजाता

गुस्सा हो कर मुझे डाँटती, कहती "नीचे आजा"
पर जब मैं न उतर कर आता, हँस कर कहती, "मुन्ना राजा,

नीचे उतरो मेरे भैया तुम्हें मिठाई दूँगी,
नए खिलौने, माखन, मिस्री, दूध, मलाई दूँगी"

मैं हँस कर सब से ऊपर की टहनी पर चढ़ जाता
तब माँ! माँ का हॄदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता

तुम आँचल पसार कर अम्मा, वहीं पेड़ के नीचे
ईश्वर से कुछ विनती करती, बैठी आँखें मींचे

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं चुपके-चुपके आता
और तुम्हारे फैले आँचल में छुप जाता

तुम घबरा कर आँख खोलती, फिर भी खुश हो जाती
जब अपने मुन्ने राजा को, गोदी में ही पाती

इसी तरह कुछ खेला करते, हम तुम धीरे-धीरे
यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ, होता यमुना तीरे!!!

Translated by C.P. Ravikumar

If only this Kadamba tree was in the banks of river Yamuna,
I too, Mother, would be some day, the young Gopala Krishna!

Buy me a flute, will you mother, it will only cost you a dime.
When I play it, a Kadamba stem will bow and to the ground recline.

I will not tell you where I went, and go silently to the tree,
sit on the stem which bent down for me and climb up merrily.

Sitting on the top of the tree I will Oh play the little flute
Amma! Amma! I will call out in a merry musical note.

Oh you will be so happy, Amma, when you listen to my call.
You will drop all your chores and rush to find your little doll.

See you coming, I will stop playing, and give you a proper scare
by hiding behind the Kadamba leaves and playing a note from there!

You will find me anyhow and you will be so Oh so mad at me!
But when I don't budge, your softened voice will call me lovingly,

"Come down, my little charming prince, and you can have a piece of pie
with butter and milk and raisins ... and I will even buy you a toy."

I will simply laugh and climb some more, up the tree so high
and your heart'll miss a beat and you'll let out a fearful cry!

You'll fold your hands and close your eyes and you'll begin to pray,
you'll pray to the gods and in between sobs, ask them to show you the way!

Seeing you pray with your eyes closed, I'll come down silently.
I'll tip toe behind your back and hug you in a fit of glee.

Startled, you'll open your eyes, and there you'll find me laughing.
You'll join me in my laughter and embrace your little king.

Mother, we could have so much fun playing like this all day!
If only this Kadamba tree was washed by Yamuna's gentle spray!

Prayer Song

असतो मा सत् गमय...
तमसो मा ज्योतिर्गमय...
मृत्योर्मा अमृतम् गमय

दया कर दान विद्या का हमें परमत्मा देना
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना

हमारे ध्यान में आओ प्रभू आँखों में बस जाओ
अँधेरे दिल में आ करके, परम ज्योती जगा देना

बहा दो प्रेम कि गँगा दिलों में प्रेम का सागर
हमें आपस में मिल जुलकर, प्रभू रहना सिखा देना

हमरा धर्म हो सेवा, हमरा कर्म हो सेवा
सदा इमान हो सेवा, व सेवक जन बना देना

वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना
वतन पर जान फ़िदा करना, प्रभू हमको सिखा देना

ओम् सहना ववतु सहनौ भुनक्तु सहवीर्यम् करवावहै
तेजस्विनावधीतमस्तु, मा विद्विशावहै
ओम् शांतिः शांतिः शांतिः

Saturday, May 16, 2009

बढ़े चलो जवान ...

बढ़े चलो जवान, बढ़े चलो जवान, बढ़े चलो जवान
रुको नहीं झुको नहीं, बढ़े चलो …

१) आज तेरे अँग में शौर्य का निखार है
बढ़े चलो बहादुरो यह देश की पुकार है
जन्म भूमि सींचने को रक्त बेकरार है
जहान देख ले सपूत देश पर निसार है
देख तेरी चाल को मचल पड़े जहान, बढ़े चलो …

२) शांति के दिये में आज एक बाती डाल दो
शिथिल पड़े न योजना क्रान्ति को उबाल दो
मुस्कुरा के राह से पर्वतों को टाल दो
एक-एक दुश्मनों को व्योम में उछाल दो
दुश्मनों की तोप से झुके न तेरि शान, बढ़े चलो …

३) धरा का वक्ष फोड़ दो आसमान तोड़ दो
धरा में गर लहू रहे तो हाथ से निचोड़ दो
पकड़ के शेर! बुजदिलों की हड़्डियाँ मरोड़ दो
मार दुश्मनों को आज घाटियों में छोड़ दो
लगा दो गहरी चोट कि मिटे नहीं निशान, बढ़े चलो …

कदम बढ़ेंगे ...

कदम बढ़ेंगे नहीं रुकेंगे
दुश्मन ने ललकारा है, दुश्मन ने ललकारा है
हमको अपनी धरती प्यारी,
भारत देश हमारा है, हमारा है, हमारा है

१) देश भक्ति के दीप सिखा के हम दीवाने परवाने
बलिपथ के मतवाले राही चलते हैं सीना ताने
तन देंगे धन देंगे इसपर प्राण न्योछावर कर देंगे
काली रण चण्डी का आँगन झरी मुण्ड से भर देंगे
तन की हर हड़्डी चमकेगी मानो तेज दुधारा है
हमको अपनी धरती …

२) जगो देश की प्यारी बहनों जगो देश की माताओं
वीर पत्नियों उठो कि रण के सब सामान सजा लाओ
बहा हमारा अगर पसीना शस्त्रों की तैय्यारी है
एक खून की बूंद हमारी सौ दुश्मन पर भारी है
वीर सैनिकों उठो कि तुमको माँ ने आज पुकारा है
हमको अपनी धरती …

३) वह कैसे सोएगा सुख से जिसका दुश्मन जीता है
“जागो उठो शत्रु को मारो” गाती अपनी गीता है
साँसों में तूफ़ान बसा है बोली में पलती आँधी
हमने तो अपने पैरों में महा प्रलय की गती बाँधी
मरो देश के लिये सपूनों यही हमार नारा है
हमको अपनी धरती …

एक रहेंगे …

एक रहेंगे, एक रहेंगे,
एक रहेंगे एक सदा इस देश में चलने वाले हम,
विपदाओं से लड़ने वाले तूफ़ानों के पाले हम,
एक रहेंगे …

१) हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई मिलकर जनगण गाते हैं
कौमी झंडा फहराते हैं देश के आन पे जान लुटा दें
ऐसे हैं मतवाले हम, एक रहेंगे …

२) कितनी सुन्दर कैसी मनहर भाषाओं की फुलवारी
रंग बिरंगे फूलों से है महक रही हर क्यारी-क्यारी
फुलवारी के माली हम हैं फूलों के रखवाले हम, एक रहेंगे …

जय जय राष्ट्र निशान ...

जय जय राष्ट्र निशान, जय जय राष्ट्र निशान।
तुझ में है भारत का गौरव, तुझ में है भारत का वैभव।
भारत की एकता तुझी में, है भारत सम्मान, जय जय …

१) तुझ में है इतिहास हमारा, तुझ में आज़ादी का नारा
आज़ादी का वह दिन प्यारा, जो भारत की शान, जय जय …

२) जग में सबसे ऊपर उठकर, विश्व प्रेम की सीख सिखा कर
सत्य अहिंसा पाठ पढ़ाकर, उस बापू की आन, जय जय …

यह बच्चों का वर्ष ... (1979)

यह बच्चों का वर्ष हमारा, यही हमारी शान
प्रकृति हमारा स्वागत करती बदल-बदल परिधान
यही हमारी शान ...

१) अमर रहेगा सन्न उन्नासी मानवीय इतिहास में
राष्ट्रीय सम्पत्ति हमीं हैं शांति क्रांति परिहास में
दायित्वों का बोध कराते स्त्रोत मूक जन-शक्ति के
अवसर की समानता होगी प्रगति वृद्धि अभिव्यक्ति के
बच्चे की मुस्कान रहेगी सदा राष्ट्र की शान
प्रकृति हमारा ...

२) समय सबल है भाग्य प्रबल है दिशा बनी अनुकूल
प्राणों से प्रिय पीढी अपना उड़ा रही है धूल
स्वस्थ और गतिमान चरण हैं बढ़ने का संकल्प
हम भविष्य की आशाओं का कोई नहीं विकल्प
हमसे अच्छा कौन फूल है बिखराता मुस्कान
प्रकृइ हमारा ...

३) हम न चाहते सोना चाँदी हम चाहे उत्साह
लिए सफ़ेदी हाथों में हम मिटा रहे हैं स्याह
प्राची में है शेष अँधेरा हम लाएँगे भोर
गुँजा रहे सँगीत पवन में कोकिल मोर 'चकोर'
प्यार भरी झपकी लेते हैं हम कल के इन्सान
प्रकृति हमारा ...

४) नए विश्व के निर्माता हैं कर्णधार इस देश के
दुनिया के इस रंगमंच पर सूत्रधार परिवेश के
शिक्षा-दीक्षा के विकास का कार्य जिसे है करना
उस समाज को पालन-पोषण का भी है ऋण भरना
कठिनाई से भरे रास्ते को करना आसान
प्रकृति हमारा ...

५) हमें हर्ष है हम बच्चों का वर्ष हुआ आरम्भ
भावी-आशाओं की गरिमा हुई यहाँ प्रारम्भ
हम व्रत लेते आज यहाँ बन्धुत्व-भाव की जय हो
बच्चों का संकल्प सत्य हो कल की आज विजय हो
निर्धारित हो सत्य सुकोमल शेष न हो अनुमान
प्रक्रृति हमारा ...

The Flag Song ...

विजयी विश्व तिरँगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा।
सदा शक्ति बर्साने वाला, वीरों को हर्षाने वाला।
मातृ भूमि का तन मन सारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा।

आओ प्यारे वीरों आओ, देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ।
एक साथ सब मिलकर गाओ, प्यारा भारत देश हमारा।

इसकी आन न जाने पावे, चाहे जान भले ही जावे।
विश्व विजय कर के दिखलावे, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा।